
विद्यालय इतिहास
अनुक्रम
- लेख मंतव्य
- मूल आदर्श
- गुरुकुल परंपरा
- संघ स्थापना
- संघ का मूल कार्य: शाखा
- संघ के अनुषंगी कार्य
- संघ परिवार
- स्थापन प्रेरणा
- सरस्वती शिशु मंदिर (कक्षा १-५)
- सरस्वती विद्या मंदिर (कक्षा ६-१२)
- पंडित दीनदयाल उपाध्याय
- श्री ब्रह्मावर्त सनातन धर्म महामंडल (SBSDM)
- सिंह परिवार
- विद्यालय इतिहास
- विद्यालय आरंभ
- विद्यालय भवन
- विद्यालय छात्रावास
- आपात काल
- उत्थान पुनरुत्थान
- युग भारती इतिहास
- युग भारती इतिहास
लेख मंतव्य
यह दीनदयाल विद्यालय का संक्षिप्त इतिहास है। इसका उद्देश्य सभी विवरण देना नहीं है, अपितु दीनदयाल विद्यालय के आदर्शों को समझना व स्मरण रखना है, ताकि हम अपने जीवन में उनका अनुसरण कर सकें। दीनदयाल विद्यालय के निर्माण में अनेक कारक थे। मुख्य कारकों का सार निम्नांकित है। स्वयं में प्रत्येक कारक पर कई ग्रंथ लिखे जा सकते हैं, लिखे भी गये हैं। परंतु यहाँ पर मुख्य उद्देश्य उनका स्मरण करना है, विवरण देना नहीं। जिनको रुचि है, वे प्रदत्त योजकों पर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
मूल आदर्श
गुरुकुल परंपरा
दीनदयाल विद्यालय प्राचीन भारत की गौरवशाली गुरुकुल परंपरा का आधुनिक रूप है। गुरुकुल में सभी बालक सिद्ध व समर्पित गुरुओं के पारिवारिक संरक्षण में पाठ्यवस्तु के साथ साथ जीवन यापन की शैली भी सीखते थे। १३०० वर्ष तक भारत पर अनेक आक्रमण हुए व अनेक आक्रांताओं का अधिपत्य रहा। इन दुष्टों ने भारतीयों की हत्या की तथा भारत को लूटा। इससे भी अधिक, उन्होंने योजनापूर्वक हिंदू धर्म व भारतीय संस्कृति की परंपराओं को नष्ट किया। ऐसी ही एक परंपरा थी: गुरुकुल। विदेशी शासकों व उनकी संस्थाओं ने अनेक उपायों से गुरुकुल व हिंदू शिक्षा पद्धतियों को नष्ट किया।
संघ स्थापना
दीर्घकालिक दासता के उपरांत १९वीं व २०वीं शती में भारत को जगाने हेतु अनेक नेताओं का आविर्भाव हुआ। इनमें से प्रमुख थे: डॉ. केशव बलिरम हेडगेवार। केशव बचपन से ही प्रखर देशभक्त थे, तथा देश की स्वतंत्रता हेतु उन्होंने उस समय प्रचलित सभी उपायों का प्रयोग किया। अंत में वे इस निर्णय पर पहुँचे कि हिंदू एकता ही भारत की सुरक्षा एवं समृद्धि का एकमात्र स्थाई उपाय है। दुर्भाग्य से, परिणाम की शीघ्रता में, तथा तुष्टिकरण में, तात्कालिक सभी उपाय भारत की आत्मा – हिंदू धर्म व संस्कृति – की उपेक्षा कर रहे थे। केशव ने उन सबको छोड़कर अपना अलग मार्ग बनाया। अपनी विलक्षण दृष्टि से, अपने दूरगामी लक्ष्य हेतु, उन्होंने एक सर्वथा नवीन तंत्र बनाया। १९२५ में, नागपुर, महाराष्ट्र में, उन्होंने संघ की स्थापना की: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)। उनके जीवन काल में ही संघ का प्रसार भारत के अनेक भागों में हो गया। १९४० में उनकी मृत्यु के बाद श्री गुरु जी (माधव सदाशिव गोलवलकर) ने संघ का नेतृत्व किया। सहस्रों प्रचारकों के अथक परिश्रम से संघ शनैः शनैः संपूर्ण भारत में पहुँच गया।
संघ का मूल कार्य: शाखा
अपने मूल में, संघ का कार्य अत्यंत स्पष्ट व सरल है: शाखा! शाखा अर्थात् सभी स्थानीय जनों का किसी स्थान पर एकत्रीकरण, फिर एक घंटे तक विविध कार्यकलाप, यथा: ध्वज प्रणाम, खेल खेलना, समता अभ्यास, गीत गायन, विविध चर्चा, तथा, अंत में, भारत माता की प्रार्थना। सुनने, देखने में यह कार्य बचकाने लगते हैं। परंतु समवेत करने से, समवेश करने से, नित्य करने से, विधिवत करने से, ये बचकाने कार्यकलाप प्रतिभागियों (स्वयंसेवकों) के मध्य एक अटूट बंधन बना देते हैं। परस्पर विश्वास के साथ, ये कार्यक्रम स्वयंसेवकों में धर्म व देश हेतु अमिट प्रेम भी जाग्रत करते हैं, जो कि अंततः उनको भारत माता के चरणों में अपना सर्वस्व बलिदान करने हेतु प्रेरित करता है। इसी शाखा के माध्यम से संघ का निरंतर प्रसार हुआ, तथा संघ विश्व का विशालतम संगठन बना।
संघ के अनुषंगी कार्य
संघ का मूल कार्य शाखा है। पर अपनी देशभक्ति से प्रेरित संघ के कार्यकर्ता मातृभूमि की सेवा हेतु स्वयं ही नित नये उपाय खोजते रहे। एक के बाद एक, वे जीवन के, समाज के, सभी क्षेत्रों में गये, तथा वहाँ संघ के आदर्शों का प्रचार-प्रसार किया। शिक्षा, धर्म, कृषि, श्रम, सेवा, राजनीति, प्रवासी – कोई भी क्षेत्र उनसे अछूता नहीं रहा। संघ के कुछ प्रमुख सह संगठन निम्नांकित हैं।
संघ परिवार
– विद्यार्थी परिषद
– बजरंग दल
– भारतीय जनता पार्टी (पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ)
– किसान संघ
– मज़दूर संघ
– हिंदू स्वयंसेवक संघ
– सेवा भारती
– विश्व हिंदू परिषद
– राष्ट्रीय मुस्लिम मंच,
आदि
स्थापन प्रेरणा
सरस्वती शिशु मंदिर (कक्षा १-५)
ऐसा ही एक संगठन था: शिशु शिक्षा समिति। संघ के नेतृत्व ने बाल शिक्षा के महत्व व दुर्दशा का अनुभव किया। यथा: बाल कल की शिक्षा का प्रभाव जीवन भर रहता है। यथा: एक घंटे की शाखा बालकों की संपूर्ण शिक्षा हेतु पर्याप्त नहीं है। यथा: तत्कालीन तंत्र व स्कूलों का ध्यान केवल भौतिक शिक्षा पर था, उसमें धर्म, आदर्श, संस्कार का सर्वथा अभाव था। अतएव संघ नेतृत्व ने बाल शिक्षा हेतु स्वयं का तंत्र बनाया: सरस्वती शिशु मंदिर (SSM)। प्रथम शिशु मंदिर गोरखपुर में १९५२ में आरंभ हुआ। यह शिक्षा तंत्र तीव्र गति से लोकप्रिय हुआ, तथा एक ही दशक में पूरे प्रदेश में फैल गया। सभी जिलों व नगरों में एक शिशु मंदिर बन गया। बड़े नगरों में अनेक शिशु मंदिर बन गए। इन शिशु मंदिरों से उत्तीर्ण लाखों बालकों के मन में आज भी अपने शिशु मंदिर हेतु चिरंतन प्रेम है। इसी प्रेम के वश उन्होंने अनेक पूर्व छात्र संस्थाएँ बनायी हैं, तथा अपने शिशु मंदिर के साथ मिल कर कार्य करते हैं।
सरस्वती विद्या मंदिर (कक्षा ६-१२)
शिशु मंदिरों की अभूतपूर्व सफलता के बाद संघ नेतृत्व का ध्यान किशोर शिक्षा पर गया। यह आवश्यक था कि कोमल आयु में प्राप्त शिक्षा जीवन निर्माण के वर्षों में भी चलती रहे। इस उद्देश्य से संघ ने एक और संगठन बनाया: विद्या भारती। विद्या भारती ने मध्य तथा उच्च स्तर पर शिक्षा हेतु विद्यालय खड़े किए: सरस्वती विद्या मंदिर। यह विद्यालय सभी प्रदेशों में बने। लगभग सभी विद्यालय छात्रावास से युक्त थे, ताकि गुरुकुल परंपरा चलती रहे।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय
उत्तर प्रदेश में जन्मे दीनदयाल जी संघ के सर्वाधिक उज्ज्वल कार्यकर्ताओं में से थे: उच्च शिक्षित, पाठक, लेखक, विचारक, वक्ता, आदि। १९३७ में उनका संघ से परिचय हुआ, तथा शीघ्र ही, १९४२ में वे आजीवन प्रचारक बन गए। १९४८ में सरकारी नियमों के पालन हेतु संघ को अपना संगठन संविधान लिखना था। यह कार्य गुरु जी ने दीनदयाल जी को सौंपा। १९५१ में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने राजनीति क्षेत्र में जनसंघ की स्थापना की, और गुरु जी से कार्यकर्ताओं की माँग की। इस हेतु अनेक कार्यकर्ता चुने गए, उनमें प्रमुख थे दीनदयाल जी। उत्तर प्रदेश के महामंत्री के रूप में उन्होंने जनसंघ का कार्य आरंभ किया। शीघ्र ही वे राष्ट्रीय महामंत्री बना दिए गए, व १५ वर्ष तक उस पद पर अनेक अध्यक्षों के साथ कार्य किया। उनके कार्यकाल में जनसंघ ने तीव्र विकास किया। मत संचय त्रिगुणित हो गया: ३% से ९%। लोकसभा सदस्य दशगुणित हो गए: ३ से ३५। दिसंबर १९६७ में, कालीकट अधिवेशन में, दीनदयाल जी को जनसंघ का अध्यक्ष चुना गया।
फ़रवरी १९६८ में उनकी दुखद मृत्यु हो गयी। एक रेल यात्रा के दौरान उनका शव मुग़लसराय स्टेशन के पास पड़ा मिला। उनकी मृत्यु का रहस्य कभी नहीं सुलझा। संदेह यह है कि राष्ट्रीय पार्टी जनसंघ के निरंतर उत्थान से डर कर, चिढ़ कर, राष्ट्रद्रोही तत्वों ने उनकी हत्या का षड्यंत्र किया।
दीनदयाल जी एक विलक्षण अध्येता भी थे। उन्होंने अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया, तथा अनेक पुस्तकें लिखीं। उनका सबसे बड़ा योगदान है – एकात्म मानववाद – जो कि जनसंघ का वैचारिक आधार बना।
श्री ब्रह्मावर्त सनातन धर्म महामंडल (SBSDM)
भारतीय समाज में हिंदू मूल्यों के क्षरण से चिंतित होकर, कानपुर के कुछ वरिष्ठ जनों ने, हिंदू आदर्शों की रक्षा एवं प्रसार हेतु एक संगठन बनाया। संगठन था – श्री ब्रह्मावर्त सनातन धर्म महामंडल। इस संगठन ने अनेक क्षेत्रों में कार्य किया: शिक्षा, चिकित्सा, धर्म, आदि। इस उद्देश्य हेतु महामंडल ने अनेक संस्थाएँ बनायीं।
सिंह परिवार
कश्मीर का मूल निवासी सिंह परिवार दीर्घ समय से कानपुर में बस गया था। इसी परिवार के श्री विक्रमाजीत सिंह कालांतर में महामंडल के अध्यक्ष बने। उनके कार्यकाल में महामंडल ने अभूतपूर्व प्रगति की। वर्ष १९२१ में उन्होंने सनातन धर्म महाविद्यालय (SD College) की स्थापना की। उनकी मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र श्री नरेंद्रजीत सिंह ने महामंडल का कार्यभार संभाला। सम्मान से सभी लोग उनको बैरिस्टर साहब कहते थे। श्री नरेंद्र की पत्नी श्रीमती सुशीला भी देशभक्त व धर्मप्रेमी थीं। कश्मीर व पंजाब की पारिवारिक परंपरा के अनुसार घर में सभी सुशीला जी को बूजी (बुआ जी) कहते थे। दीनदयाल जी की हत्या सभी देशभक्तों के लिए एक बड़ा आघात था। बूजी (सुशीला) ने तय किया कि दीनदयाल जी की स्मृति में, उनके आदर्शों को जीवित रखने हेतु, एक भव्य विद्यालय बनाएँगे। श्री नरेंद्र भी बूजी से सहमत थे कि यह कार्य होना चाहिए। यह विद्यालय था: पंडित दीनदयाल उपाध्याय सनातन धर्म विद्यालय।
विद्यालय इतिहास
विद्यालय आरंभ
१९७० में गुरु पूर्णिमा के शुभ दिन (१८ जुलाई) दीनदयाल विद्यालय का आरंभ हुआ। आरंभ सामान्य सा था: एक अन्य विद्यालय में एक कक्षा, २४ छात्र, एवं ३ आचार्य। पर बूजी दृढ़प्रतिज्ञ थीं कि विद्यालय का स्वयं का एक समुचित स्थान हो। स्वयं के संसाधनों व निरंतर प्रयास से उन्होंने विद्यालय का भवन बनवाया। भवन के निर्माण हेतु भूमि पूजन संघ के मुख्य संचालक श्री गुरु जी द्वारा किया गया। १९७१ में विद्यालय नवाबगंज में अपने भवन में आ गया। संघ एवं सभी अनुषंगी संगठन नवीन विद्यालय की सफलता हेतु प्रतिबद्ध थे। अतः अनेक स्थानों से चुन-चुन कर अनेक श्रेष्ठ आचार्यों को विद्यालय में लाया गया। यथा: श्री चंद्रपाल सिंह, श्री शंतनु रघुनाथ शेंडे, श्री ओम शंकर त्रिपाठी, श्री प्रयाग सिंह, श्री आनंद वर्मा, श्री ज्ञानेंद्र शर्मा, श्री दीपक राजे, आदि।
विद्यालय भवन
हर विद्यालय का भवन होता है। अधिकांश भवन विशाल होते हैं। कुछ भव्य भी होते हैं। पर दीनदयाल विद्यालय का भवन विलक्षण था। वह विशाल और भव्य तो था ही। पर साथ ही कलात्मक था। और दिव्य था। कला यह थी कि सामान्य आकार सरल रेखा के बजाय भवन अर्धवृत्ताकार था। कल्पना कीजिए एक द्वितल अर्धवृत्त की। और उसके सामने एक विशाल गोलाकार हरित दूर्वाच्छादित प्रांगण। प्रांगण की परिधि पर पुष्प-क्यारी। बीच-बीच में विशाल वृक्ष। परिधि को घेरे एक चौड़ा मार्ग। लिखते-लिखते भी स्फुरण हो रहा है। इस सुंदरता एवं वातावरण का आनंद वही जानते हैं, जो उस घास पर खेले हैं, जो उस मार्ग पर चले हैं, जो प्रातः उठ कर शिरीष व कदंब वृक्षों के तले पुष्प पुंज को देख विस्मित हुए हैं, उसकी सघन गंध में चकित हुए हैं, उन पुष्पों को बटोर मुदित हुए हैं।
अब चलते हैं भवन के अंदर। दोनों तलों पर बारह बड़े कक्ष, कोनों पर प्रयोगशाला हेतु और बड़े कक्ष। पर वास्तविक आकर्षण तो मध्य में था: विशाल कक्ष! लंबाई और चौड़ाई तो अधिक थी ही, पर छत के अति उच्च होने से भव्यता का भाव द्विगुणित हो जाता था। कक्ष के अंत में एक विशाल चबूतरा, जिसके मध्य में श्वेत मार्बल का मंदिर। और मंदिर में स्थापित बूजी के प्रिय आराध्य पवनसुत हनुमान की विशाल पंचधातु प्रतिमा। विद्यालय यदि शरीर था, तो मारुति-मंदिर उसकी आत्मा था। यह मंदिर ही था, जिसकी दिव्यता विद्यालय के कण-कण में व्याप्त थी। वह दिव्यता विशाल कक्ष में तो घनीभूत थी ही, पर संपूर्ण परिसर में भी अनुभव होती थी।
भवन के पीछे एक विशाल तरण ताल था। पार्श्व के विशाल प्रांगण में एक फ़ायरिंग रेंज थी। परिसर की सीमा पर अनेक प्रकार के हरे-भरे वृक्ष थे। क्या कल्पना रही होगी बूजी के मन में छात्रों के व्यक्तित्व विकास की, सोचकर रोमांच होता है। कोई आश्चर्य नहीं कि विद्यालय का भवन, विशेषतः मंदिर, पूरे नगर ही नहीं, प्रदेश में प्रसिद्ध है।
विद्यालय छात्रावास
गुरुकुल की परिकल्पना आरंभ से ही विद्यालय के स्थापकों के मन में थी, तदनुसार एक परिपूर्ण छात्रावास की योजना भी थी, जिस हेतु उन्होंने भवन एवं आवास की सभी व्यवस्थाएँ कीं। द्वितीय वर्ष से ही छात्रावास में निकट-दूर के अनेक छात्र थे। जैसे-जैसे विद्यालय बढ़ा, छात्रावास भी बढ़ा। इस समय छात्रावास के तीन भवन हैं। दीनदयाल विद्यालय को दीनदयाल विद्यालय बनाने में छात्रावास की अहं भूमिका थी। छात्रावास में छात्र निरंतर गुरुकुल जैसे पवित्र वातावरण में रहते थे। गुरुकुल की ही भाँति, छात्रावास की दिनचर्या में सभी धार्मिक विधान सम्मिलित थे: समुचित भोजन, व्यायाम, पूजा, भजन, ध्यान, सत्संग, प्रवचन, देश-दर्शन, आदि। घर से दूर, छात्रों के लिए छात्रावास ही घर था। आचार्य माता-पिता बन गए, अन्य छात्र भाई-बहन बन गए। एक साथ सात वर्ष रहने से छात्रों का आचार्यों के साथ तथा परस्पर ऐसा बंधन बना, जो जीवन पर्यंत अटूट रहा।
आपात काल
शैशव व बाल काल में ही विद्यालय को अनेक गंभीर संकट झेलने पड़े। विद्यालय आरंभ के लगभग तुरंत बाद ही बूजी का देहांत हो गया। तब विद्यालय संभाला श्री नरेंद्र जी ने। १९७५ में देश में आपात काल लागू हो गया। संघ के सभी कार्यकर्ता बंदी बना लिए गए, जिसमें श्री नरेंद्र जी भी थे। विद्यालय का संचालन सरकार ने अपने हाथ में ले लिया, और विद्यालय का वातावरण, विद्यालय की परम्पराएँ नष्ट भ्रष्ट कर दीं। पर विद्यालय के समर्पित आचार्यों ने धैर्य नहीं छोड़ा। वे विद्यालय ही में बने रहे, छात्रों की देख-भाल करते रहे, तथा साथ ही गुप्त रूप से आपात काल के विरोध के संघ कार्य में सहयोग देते रहे।
उत्थान पुनरुत्थान
हाईस्कूल (कक्षा १०) का प्रथम बैच १९७५ में उत्तीर्ण हुआ। प्रथम बैच के साथ ही, शैक्षिक उपलब्धियों की एक अविरल शृंखला चल निकली: उच्च अंक प्रतिशत, उत्तर प्रदेश बोर्ड में उच्च स्थान, प्रतिष्ठित महाविद्यालयों में प्रवेश, आदि। इंटरमीडियेट (कक्षा १२) का प्रथम बैच १९८१ में उत्तीर्ण हुआ। वर्ष प्रति वर्ष विद्यालय का सभी आयामों पर विकास होता रहा: छात्र संख्या, आचार्य संख्या, भवन विस्तार, प्रयोगशालाएँ, अन्य सुविधाएँ, पाठ्यक्रम, पाठ्येतर कलाप, आदि। इन उपलब्धियों से मंडित विद्यालय अति प्रसिद्ध हुआ, तथा उसने श्रेष्ठ छात्रों व आचार्यों को आकर्षित किया, जिन्होंने विद्यालय को प्रदेश में सर्वश्रेष्ठ व देश में अति श्रेष्ठ स्थान दिलवाया।
युग भारती इतिहास
युग भारती इतिहास
सभी आचार्यों में, श्री ओम शंकर जी का विशेष स्थान था, क्योंकि उनके मन में छात्रों के शिक्षोपरांत जीवन का एक उदात्त चित्र था। वे नहीं चाहते थे कि उनके छात्र मात्र वृत्तिजीवी बन जाएँ, या भौतिक सफलता की अंधी दौड़ में फँस जाएँ। वे चाहते थे कि उनके छात्र गहन समर्पण के साथ धर्म व देश की सेवा करें। इस उद्देश्य से उन्होंने छात्रों के जीवन के दोनों भागों पर ध्यान दिया: विद्यालय जीवन तथा शिक्षोपरांत जीवन। विद्यालय में उन्होंने देशभक्ति व धर्मप्रेम के संस्कारों की व्यवस्था की। शिक्षोपरांत जीवन में उन्हीं आदर्शों की निरंतरता हेतु उन्होंने पूर्व छात्र संगठन बनाया: युग भारती। युग भारती के सदस्यों को उन्होंने प्रेरित किया कि वे परस्पर मिलें, विद्यालय आयें, वर्तमान छात्रों की सहायता करें, और देश कार्यों की योजना बनाएँ। उनसे प्रेरित होकर युग भारती के सदस्यों ने युग भारती को एक विधिवत संगठन बनाया, तथा अनेक प्रकल्प हाथ में लिए, यथा: वार्षिक अधिवेशन, उत्सव मिलन, देशदर्शन, विद्यालय शिक्षा सहयोग, विद्यालय भवन सहयोग, विद्यालय रजत जयंती समारोह सहयोग, सदस्य सहयोग, सदस्य मार्गदर्शन, चिकित्सा शिविर, कोविड सहायता, विविध गोष्ठियाँ, आदि।
युग भारती पर अधिक जानकारी इसी पटल पर अन्यत्र उपलब्ध है।